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रामस्नेही संप्रदाय के प्रवर्त्तक स्वामी रामचरण जी महाराज थे। इन्होंने अठारहवीं सदी के आरम्भ में इस संप्रदाय की स्थापना की।
उन्होंने गुरु को सर्वोपरि देवता मानते हुए कहा कि गुरु भक्ति के माध्यम से ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। भक्ति के समस्त साधनों एवं कर्मकाण्डों में इन्होंने राम के नाम को जपना ही सर्वश्रेष्ठ बतलाया तथा पुनर्जन्म के बन्धनों से मुक्ति पाने का सर्वश्रेष्ठ साधन माना।
उन्होंने कहा कि गृहस्थ जीवन जीने वाला व्यक्ति भी कपट रहित साधना करते हुए मोक्ष प्राप्त कर सकता है। इसके लिए गृहस्थ जीवन का त्याग करना आवश्यक नहीं है।
रामस्नेही संप्रदाय का पूजा स्थल "रामद्वारा" कहलाता है। रामचरण जी महाराज के उपदेश "अणभे वाणी "में संकलित है।
इस संप्रदाय की तीन शाखाएं हैं –
रैण में शाखा, दरियापंथ की पीठ:मेडता के समीप रैण में संत दरियावजी की गद्दी स्थित है। इनका जन्म जैतारण, पाली में हुआ।
सिंहथल शाखा, बीकानेर
इस पीठ के संस्थापक हरिरामदासजी है। इनका प्रमुख ग्रंथ ‘निसानी’ है।
खेड़ापा शाखा, जोधपुर
प्रवर्तक संत रामदासजी थे।
ये सभी निर्गुण उपासक थे।
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